Thursday, January 3, 2019

मेघालयः तीन हफ़्ते से खदान में फँसे मज़दूर, घरवालों को चमत्कार का इंतज़ारः ग्राउंड रिपोर्ट

"मैं बीते दो हफ्तों से अपने भांजों के इंतज़ार में यहां कोयला खदान के बाहर बैठा हुआ हूं. लेकिन पता नहीं वो ज़िंदा हैं भी या नहीं...."

22 साल के प्रेसमेकी दखार कोयले की खदान में फंसे अपने भांजों को याद कर भावुक हो जाते हैं.

"एनडीआरएफ़ के लोग इतने दिनों से यहां काम कर रहें है लेकिन किसी ने हमें नहीं बताया कि डिमोंमे और मेलामबोक को कब तक बाहर निकाला जाएगा."

मेघालय की अंधेरी, पानी से भरी और बेहद संकरी एक खदान में बीते 13 दिसंबर से 15 मज़दूर फंसे हुए हुए हैं.

दरअसल, ईसाई बहुल मेघालय में क्रिसमस से ठीक पहले लुमथरी गांव के ये दोनों युवक इस खदान में काम करने गए थे.

लेकिन 370 फ़ीट से भी ज़्यादा गहरी इस खदान में अचानक पानी भर आने से अंदर काम कर रहे सभी मज़दूर खदान में ही फंस गए.

हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा और बादलों का घर कहा जाने वाला मेघालय एक ख़ूबसूरत राज्य है, मगर अवैज्ञानिक और ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से जारी कोयला खनन और मज़दूरों की मौत की घटनाएं मेघालय को बदनाम कर रही हैं.

इस हादसे को लेकर परेशान प्रेसमेकी कहते हैं, "इलाके में बेरोज़गार युवकों की एक बड़ी आबादी है. जिनके पास कोयले की खदान में काम करने के अलावा और दूसरा विकल्प नहीं है क्योंकि खेती के काम में न इतनी कमाई है और न ही सबके पास उतनी ज़मीन है."

क्या उनको या फिर परिवार के लोगों को डिमोंमे और मेलामबोक के ज़िंदा बचने की उम्मीद है - ये पूछने पर वे कहते हैं, "इस घटना के 15 दिनों के बाद भी हमें लग रहा था कि मेरे दोनों भांजे जीवित बाहर आ जाएंगे. लेकिन जब भारतीय नौ सेना के गोताखोर पानी के अंदर जाकर कुछ भी तलाश नही सके तो हमारी उम्मीदें टूटने लगी हैं. कोई भला 20 दिन तक ऐसी ख़तरनाक अंधेरी खदान में कैसे ज़िंदा रह सकेगा. अगर ईश्वर कोई चमत्कार कर दे तो ही ये संभव होगा."

मेघालय के ईस्ट जयंतिया हिल्स ज़िले के जिस कोयला खदान में ये हादसा हुआ है, वहां तक पहुंचना आसान नहीं है.

जोवाई-बदरपुर नेशनल हाइवे से होते हुए मैं खलिरियाट तक तो पहुंच गया था लेकिन इसके आगे का सफर बेहद मुश्किल था.

दरअसल खलिरियाट से आगे क़रीब 35 किलो मीटर गाड़ी से पहुंचने के बाद लुमथरी गांव के पास खलो रिंगसन नामक इलाक़े में इस कोयला खदान तक पहुंचने के लिए टूटे फूटे पहाड़ी रास्ते और तीन छोटी-छोटी नदियों को पार करना पड़ता है.

खलिरियाट से इस इलाक़े में प्रवेश करते ही सड़क की दोनों तरफ़ कोयले के ढेर लगे हुए दिख जाते है जहां शनिवार को भी मज़दूर आम दिनों की तरह ही ट्रकों में कोयला लाद रहे थे.

ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि यहां अवैज्ञानिक तरिक़े से चल रही कोयला खदानों पर 2014 से नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का प्रतिबंध है.

खदान में फंसे अपने चचेरे भाई का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे 28 साल के फाइहुनलांग सुबा अब अपने किसी भी रिश्तेदार और दोस्त को इन कोयला खदानों में काम करने के लिए नहीं भेजेंगे.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "इस कोयले की खदान में फंसा मेलाम दकार मेरा चचेरा भाई है. वो पहली बार कोयले की खदान में काम करने गया था."

"उसे रैट होल माइनिंग में काम करने का कोई अनुभव नहीं है. मैं जब इस गहरी खाई को देखता हूं तो डर के मारे कलेजा बैठ जाता है. पता नहीं उसका क्या हाल हुआ होगा."

"मैं कभी कोयले की खदान में काम नहीं करूंगा. भले ही भूखा मर जाउंगा."

एक सवाल का जवाब देते हुए फाइहुनलांग ने कहा, "हम काफ़ी ग़रीब और बेरोज़गार हैं. इस इलाक़े में अगर ज़िंदा रहने के लिए कई लोग अपनी जान का जोखिम उठाते हैं."

"मेलाम क्रिसमस से पहले थोड़ी ज्यादा कमाई करना चाहता था. इसलिए वो कोयले की खदान में काम करने चला गया. पता नहीं मैं दोबारा उससे कभी मिल पाऊंगा या नहीं."

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